आज की मशीनी जिदंगी की भागम भाग आवाजाही और ऊहापोह में आदमी को ठीक से भोजन कर पाने का वक्त नहीं रोटी-रोजी की जद्दोजहद, लिहाजा आसानी से जो मिल गया आधा पोना खाया पीया ओर भाग उठे रो की जंग में जुझने। तो लोग इस सिस्टम से समझौता करते हुए शॉर्ट ट्रेक को एडाप्ट करते। इसी हालत को चलते तैयार खाने पीने की चीजों ने जन्म लिया। बड़ी कम्पनी अपने प्रोडेक्ट लेकर मार्केट में आए इसकी ग्रोथ ओर छप्पड़फाड़ मुनाफा देखकर ओर भी नामी गिरामी कम्पनी भी प्रति स्पर्धा में खडी हो अपनी शुद्धता स्वाद के लाजवाबी का गाना बजाना लगी। बेहतर है लेकिन इस धंदे के फैलते मुनाफे से आकर्षित होकर अनेक लोगो की दिलचस्पी बडी और अनेक लोग एस बिजनेस मे कूद गए। कोई एतराज नहीं सभी को जीवन यापन के लिए रोजगार करने का भी हक है। लेकिन व्यापक जनहित और स्वास्थ हित मे सरकारी कायदे कानून मापदंड का कितना पालन किया जाता है। यह सोचने की बात है। मधुर मोहक लुभावने नाम से ऐसे अनेक प्रोडेक्त बाजार की शोभा झाकी बने हुए हैं। छोटे बड़े सब खा रहे है। इनके चटपटे चिरपिरी खट्टे मीठे जायके कल्पना भर से मुंह पानी से भर जाता है। लेकिन यह एक अहम बात है इनके निर्माण की स्थिति वातावरण इस्तमाल किए जाने बाली सामग्री अवसान तिथि आदि की नियमित क्या। जांच पड़ताल माॅनिटरिंग की जाती है। उसका शेड्यूल क्या है। सब कुछ बेहतर है। तो फिर आए दिन छापा मारी और घटिया, डेड प्रोडेक्ट नहीं मिलना चाहिए। अपनी सरकार इस मामले से सजग व सतर्क है। सख्त रुख अपनाए हुए है। यह स्वागत योग्य और सर्वत्र सराहना योग्य पहल है। हमे यह अपेक्षा करना चाहिए कि सरकार ऐसी चाक चोबंद रखे। ताकि ये जुमला उलट जाए पैकिटों मे बन्द नमकीन मौत। बल्कि यह धारणा मान्यता फले फूले प्रभु। प्रसाद पैकटो में आपके हाथों में है। नर्मदे हर।
पंकज पटेरिया (Pankaj Pateria) वरिष्ठ पत्रकार