– विनोद कुशवाहा :
हिंदी साहित्य में प्रमुख रूप से दो विधायें ही प्रचलित हैं। गद्य तथा पद्य लेखन। वर्तमान में पद्य लेखन ज्यादा किया जा रहा है। गद्य लेखन में लेखकों की रुचि धीरे-धीरे कम होती जा रही है। उसमें भी पत्र – लेखन विधा तो समाप्त प्रायः ही है।
इन दिनों प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों में एकाध ही कोई दैनिक, साप्ताहिक अथवा पाक्षिक समाचार – पत्र ऐसा होगा जिसमें नियमित रूप से पत्र – लेखन स्तम्भ प्रकाशित किया जा रहा है। जबकि जन समस्याओं की ओर शासन का ध्यान आकर्षित करने के लिए इससे बेहतर कोई माध्यम नहीं रह गया है क्योंकि कई बार जहां हमारे पत्रकार मित्र भी नहीं पहुंच पाते वहां पत्र – लेखक पहुंच जाते हैं । यही वजह है कि आज भी शासन – प्रशासन की ओर से ऐसे पत्रों को गम्भीरता से लेते हुए उनमें उठाई गई समस्या के समाधान के लिए प्रयास भी किये जाते हैं।
समाचार – पत्रों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि किसी भी पत्र को सम्पादित न किया जाए क्योंकि अपने लिखे हुए के लिए पत्र लेखक स्वयं जिम्मेदार होता है।
प्रसन्नता का विषय है कि लुप्त होती पत्र – लेखन विधा को बनाए रखने के लिए शहर में म प्र जन चेतना लेखक संघ एवं पत्र लेखक मंच जैसी संस्थायें भी सक्रिय हैं। जो समाचार पत्रों में पत्र – लेखन को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर पत्र-लेखन कार्यशाला तथा पत्र-लेखन प्रतियोगिता का आयोजन करती रही हैं। इन सब गतिविधियों के केंद्र में पत्रकार एवं पत्र लेखक राजेश दुबे ‘ राज ‘ ही सक्रिय दिखाई देते हैं। श्री दुबे ने तो पर्यावरण के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। अब ये जिम्मेदारी सौरभ दुबे के मजबूत कंधों पर आ टिकी है। उनसे शहर को बहुत उम्मीदें हैं।
पत्र-लेखन के क्षेत्र में सक्रियता का लाभ तो मिलता ही है। जहां पुनीत पाठक , संदीप भम्मरक , गिरीश पटेल, इंद्रपाल सिंह जैसी प्रतिभाओं ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपना अलग मकाम बनाया है वहीं रोहित नागे , नरेश भगोरिया , राजेश दुबे , सौरभ दुबे ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है।
एक समय था जब स्व. जानकीप्रसाद स्वर्णकार , स्व. कमलेश सूर्यवंशी , कांतिप्रसाद दुबे जैसे दिग्गज पत्र लेखकों की प्रतिभा से ये विधा सम्पूर्ण नर्मदांचल को आलोकित कर रही थी । तो उधर प्रदेश स्तर पर पत्र-लेखन के क्षितिज पर स्व. अनिल कुमार , शब्बीर कादरी , जेठानन्द ( भोपाल ) , संतोष शर्मा सूर्य, रेहटी, सुभाष बड़ावनवाला, खाचरौद ( उज्जैन ) , कनकमल जैन , जावरा ( रतलाम ), स्व. एम सी श्रीवास्तव , अरविंद नरहरि कद्रे , विदिशा , अशोक जाटव , कुरावर मंडी ( राजगढ़ ) , सलीम खान तन्हा , राजगढ़ , अनीस मोहम्मद , ठीकरी ( खरगौन ) , स्व. के. बी. मालवीय , बैतूल आदि पत्र लेखक शोभायमान हो रहे थे।
उपरोक्त सभी पत्र लेखक म. प्र. जन चेतना लेखक संघ के माध्यम से अपने – अपने क्षेत्र में पत्र लेखन विधा को प्रोत्साहन देने हेतु सक्रिय थे। कतिपय पत्र लेखकों के अलावा शेष समस्त पत्र लेखक आज भी म प्र जन चेतना लेखक संघ के बैनर तले पत्र-लेखन विधा को बढ़ावा देने हेतु दृढ़ संकल्पित हैं।
उक्त संस्थाओं के अतिरिक्त हरदा , इंदौर आदि शहरों में भी इस विधा से जुड़ी संस्थाएं पत्र लेखक मंच जैसे अलग – अलग नामों से सक्रिय हैं। … लेकिन बात वहीं आकर रुक जाती है कि कितने ऐसे समाचार – पत्र अथवा पत्र – पत्रिकाएं हैं जो अपने अखबार या अपनी पत्रिका में आपके पत्र , पत्र संपादक के नाम , पाठकों के पत्र , लोकवाणी , पत्र वाणी जैसे स्तम्भ जारी रखे हुए हैं।
इटारसी की हम अगर बात करें तो यहां मात्र ‘ नगरकथा ‘ ही ऐसा साप्ताहिक समाचार-पत्र है जिसने अपने अखबार का पूरा एक पृष्ठ ही पत्र लेखकों को समर्पित कर दिया है। इसके लिए निश्चित ही ‘ नगर कथा ‘ धन्यवाद का पात्र है । साथ ही उन सभी पत्र लेखकों का भी मैं आभारी हूं जिन्होंने संपादक के नाम निरन्तर पत्र लिखकर इस विधा को लुप्त होने से बचाये रखा है।
विनोद कुशवाहा (Vinod Kushwaha)