- पंकज पटेरिया, वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार

हाल ही में, प्रदेश के एक जिले में ‘अंगुली’, ‘थप्पड़’ और ‘मुक्के’ का एक दिलचस्प किस्सा अखबारों की सुर्खियां बना। लोग इसे चटकारे लेकर पढ़ते रहे। लुत्फ पसंद लोगों के लिए यह एक चटपटी खबर बन गई, जो उनके मुंह में शहद घोलती रही। अखबारों को भी बैठे-बिठाए एक ऐसी ‘चिडिय़ा’ मिल गई, जो रोज नए गुल खिलाएगी।
आखिरकार, एक माननीय और एक साहब बहादुर के बीच हुई इस घटना का अंजाम क्या होता है, यह तो वक्त ही बताएगा। कौन नपता है, और किसे ‘नाप-माप में रहने’ का हुक्म दिया जाता है। अलबत्ता, मध्यप्रदेश आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष मनु श्रीवास्तव ने इस मामले में मुख्यमंत्री एवं मुख्य सचिव से बात करने का स्टेटमेंट दिया है।
जो भी हो, लेकिन ऐसी घटनाओं से बड़ी किरकिरी होती है। और फिर, अंगुली नहीं, बल्कि अंगुलियां उठना शुरू हो जाती हैं। यह समझना बड़ा मुश्किल होता है कि अंगुली और अंगूठा जब मिलते हैं, तब मुक्का बनता है। थप्पड़ भी जब तनता है, तो सब संगठित होते हैं। इसकी जरूरत काले चेहरों को सुधारने में होती है, न कि आपस में भिडऩे से। ‘सबका साथ, सबका विकास’ की थीम की सफलता इसमें ही निहित है।









