बहुरंग : जनकवि संतोष चौरे का यूं चले जाना

बहुरंग : जनकवि संतोष चौरे का यूं चले जाना

– विनोद कुशवाहा : 

वैसे तो अक्सर “बहुरंग” में आनंद का अतिरेक ही मौजूद रहता है लेकिन आज इस कॉलम में खामोशी छाई हुई है। कलम भी मौन है। सुर्खियां कुंद हो गई हैं। प्रहार लुप्त हो गए हैं। … इस सबके मूल में एक ही कारण है जन कवि संतोष चौरे का हमारे बीच से अनायास ही यूं चले जाना। ‘ बैंक ऑफ इंडिया ‘ की इटारसी शाखा से उनकी सेवानिवृत्ति के बाद तो कुछ दिनों तक हम में से किसी का भी बैंक जाने का मन ही नहीं होता था। जब कभी मजबूरी में जाना भी होता तो अंदर पहुंचते ही उनका हंसता – मुस्कुराता चेहरा याद आ जाता। मुझे ही नहीं बैंक में आने वाले हर परिचित – अपरिचित ग्राहक की मदद के लिए वे हमेशा तत्पर रहते थे।
“बैंक ऑफ इंडिया” द्वारा उनके मार्गदर्शन में आयोजित’ एक ग्राहक मिलन समारोह ‘ में उन्होंने अतिथि के रूप में बुलाकर मुझे जो सम्मान दिया उसे मैं मधुर स्मृति के रूप में हमेशा सहेज कर रखूंगा। अब इतने सरल, सहज, सौम्य स्वभाव का व्यक्ति सामाजिक गतिविधियों से कैसे दूर रह सकता था? सो वे भी इन गतिविधियों से कहां दूर रहे? अपने समाज की ही नहीं बल्कि शहर की हर सामाजिक गतिविधियों में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। सामाजिक ही क्यों इटारसी की ” न्यास कॉलोनी ” के साई मंदिर की आरती , भंडारे से लेकर शिरड़ी – यात्रा तक कोई भी गतिविधि उनके बिना सम्पन्न नहीं होती थी। कवि – हृदय होने के कारण वे इटारसी ही नहीं समूचे ‘ नर्मदांचल ‘ की साहित्यिक गतिविधियों में अग्रणी रहते थे। ” मानसरोवर साहित्य समिति ” के अध्यक्ष रहते हुए तो उन्होंने संस्था की गतिविधियों को नित नए आयाम दिए। कवि – गोष्ठियों की वे जान हुआ करते थे। शान हुआ करते थे। उनकी रचनाओं में कभी – कभार समाजवादी विचारधारा की झलक भी देखने को मिलती थी। यही वजह थी कि कामरेड चौरे जी बैंक अधिकारियों – कर्मचारियों की यूनियन में भी हमेशा सक्रिय रहे।
उनके निधन का समाचार सुनते ही समूचे शहर में शोक की लहर दौड़ गई। जिसने भी ये खबर सुनी स्तब्ध रह गया। लोग उनकी सह्रदयता की चर्चा में मशगूल हो गए। शायद ही कोई होगा जिसने पूरी शिद्दत से इस गहन संवेदनशील व्यक्तित्व को याद न किया हो। उनके मानवीय गुणों को भुला पाना किसी के लिए भी सम्भव नहीं होगा। ‘ बैंक ऑफ इंडिया ‘ की इटारसी शाखा के उनके सहकर्मी सर्वश्री अशोक ठाकुर, दुबे जी, बरबड़े जी और रवि गिरहे को तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि चौरे जी अब उनके बीच नहीं रहे। वे शोकाकुल थे। “नर्मदांचल परिवार” जन – जन के प्रिय कवि, लेखक, कथाकार, समाजसेवी, बेहद ईमानदार एवं सेवानिवृत्त कर्तव्यनिष्ठ बैंक अधिकारी संतोष चौरे के आकस्मिक निधन पर शोक व्यक्त करते हुए पूरे सम्मान के साथ उन्हें अपने ‘ श्रद्धा सुमन ‘ अर्पित करता है। युवा कवि , व्यंग्यकार सतीश पाराशर उनकी जीवन यात्रा के सहयात्री रहे हैं। उनके साथ हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर चलते रहे। एक दूसरे के सुख – दुख में भी दोनों सहभागी रहे। सतीश भाई से मेरी यही अपेक्षा रहेगी कि वे चौरे जी की अप्रकाशित रचनायें मुझे जल्द उपलब्ध करायें ताकि उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित ‘ अनाहत ‘ का आगामी अंक शीघ्र ही प्रकाशित किया जा सके। अंत मंा इतना ही कि – ” संतोष भैया हम सब आपको बहुत याद करते हैं। हम आपको कभी नहीं भूल पायेंगे ” उनका जाना मेरे लिए निजी क्षति है। वे सदा से ही मेरे सुख-दुख के साथी रहे। मैं यहां उनकी ही एक कविता के साथ उन्हें अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं –

जीवन – यात्रा
मैं अपनी संपूर्ण जीवन यात्रा को
आत्मीय बनाना चाहता हूं
जो मुझसे बिछुड़ रहे हैं
उन्हें पास लाना चाहता हूं
जीवन – यात्रा जितनी
उत्कर्षमयी होगी
अपने चरित्र की परिभाषा
उतनी ही
अनुकरणीय और वंदनीय होगी
समर्पण के संदेश को
आत्मसात् करना होगा
धूल भरे आईने को
साफ करना होगा
हे प्रभु
मेरे आचारों – विचारों को
दृढ़ इच्छा शक्ति देना
अथाह सागर की सोच के साथ
दरिया ही बने रहने देना ।

विनोद कुशवाहा
Contact : 96445 43026

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