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बहुरंग – जगत जननी माँ…

बहुरंग – जगत जननी माँ…

विनोद कुशवाहा

नवरात्रि में जगत जननी माँ का स्मरण किया जा रहा था। उनकी पूजा, अर्चना, आराधना की जा रही थी। ऐसे में मुझे अपनी माँ का स्मरण होना स्वभाविक था क्योंकि मेरे लिए वे जगत जननी से कम भी नहीं थीं ।जननी तो थीं हीं । साथ ही समूचा जगत भी उनमें समाया हुआ था। ‘थीं’ कहना इसलिये वाजिब होगा क्योंकि माँ मुझे हमेशा के लिए अकेला छोड़कर संसार से विदा हो गईं। मेरा ‘संसार’ भी तो माँ ही थीं। उनकी मृत्यु के बाद एक तरह से मेरा भी इस संसार से कोई नाता, कोई सम्बन्ध नहीं रहा। जो थोड़ा बहुत रहा भी तो वह नाममात्र का रहा, औपचारिकता मात्र । हो सकता था कि माँ के जाने के साथ ही मेरी भी इस संसार से विदाई हो जाती। मगर समय से पहले ज़िंदगी से पलायन करना मेरी दृष्टि में कहीं से भी उचित नहीं था। इसलिए ही इतने दुखों और संघर्षों के बावजूद जाने कौन सी हिम्मत थी कि मैं अपनी जगह अडिग रहा। दरअसल इसके पीछे मेरी सोच ये भी थी कि जिससे जितनी उपेक्षा, तिरस्कार, घृणा, अपमान मिलना बाकी रह गया था वह भी मिल ही जाता तो बेहतर था। मैं अपने-पराये सबसे अगले पिछले सारे हिसाब-किताब इस जन्म में ही बराबर कर लेना चाहता हूं। हालांकि मुझे मोक्ष की आकांक्षा कभी नहीं रही । केवल प्रकृति से मोह की वजह से ही मैं बार – बार इस संसार में लौटना चाहता हूं।

…तो माँ अब मेरे साथ नहीं हैं। मेरे पास नहीं हैं। रह गईं हैं तो उनकी चन्द यादें। कुछ स्मृतियां। स्मृतियां सुखद भी और दुखद भी। दुखद इसलिये क्योंकि माँ की मृत्यु असामयिक थी । यही वजह थी कि उनके इस तरह जाने से मैं कहीं अंदर तक बहुत बुरी तरह टूट गया था , बिखर गया था। पहले भाई, फिर बहन, फिर पिता और फिर माँ की दुखद मृत्यु । यानि सब कुछ खत्म । माँ के मैं बेहद करीब था । मेरे जीवन का वे केंद्र बिंदु थीं । माँ के बिछोह का अर्थ था पहाड़ जैसा दुख। उनका वियोग मेरे लिये असहनीय था । माँ का ममत्व , लाड़ , प्यार , दुलार की याद आते ही मैं विचलित हो जाता हूं । माँ ने कभी मुझसे ऊंची आवाज में बात नहीं की। कभी मुझ पर हाथ नहीं उठाया। मुझे चारों तरफ माँ का ही अक्स नजर आता था। मेरे लिए प्रेम पानी की तरह हो गया था जहां उसे थोड़ा सा भी ढाल दिखता वह बह जाता। मैं हर किसी में माँ का प्रतिबिंब देखता। … लेकिन माँ वहां कहीं नहीं होतीं। सिवा शोषण के कुछ हाथ नहीं आता। विशेषकर भावनात्मक शोषण से मैं बेहद आहत हुआ। इस प्रयास में मैं बुरी तरह जलील भी हुआ और अपमानित भी। इस सबका असर मेरे स्वभाव पर भी पड़ा। मेरी सहजता, सरलता, सौम्यता सब कुछ तहस – नहस हो गई।…. मगर विधाता का खेल अभी पूरा कहां हुआ था। कितने ही दुख देखने बाकी थे। मैंने वे दुख देखे भी और भोगे भी। अब केवल रह गया था मुस्कुराने का अभिनय और रह गया था मैं । मुझे किसी की सहानुभूति नहीं चाहिए। न ही मैं चाहता हूं कि कोई मेरे ऊपर तरस खाये । न किसी के साथ अपने दुख – दर्द बांटने का मेरा कोई इरादा है। माँ के बहाने मैं आज सबका स्मरण कर रहा हूं। अपने – पराये। उनसे जुड़े सुख – दुख। आज की स्थिति में , मैं जैसा हूं ठीक हूं। एकांतवास में। प्रकृति के नजदीक। मेरे लिए ‘ एक टुकड़ा आसमान ‘ ही काफी है । इन दिनों मैं लिख भी रहा हूं। कुछ पढ़ भी रहा हूं। कुछ देख भी रहा हूं । कुछ समझ भी रहा हूं। कुछ लोगों को जान रहा हूं। तो कुछ को पहचान भी रहा हूं। … और याद कर रहा हूं अपनी माँ को । नवरात्रि बीत गई पर माँ का पुण्य स्मरण करते हुए मेरी आंखें नम हैं । पलकें भीगी हुई हैं। बिस्तर पर लेटे हुए मैं सोच रहा हूं – ‘काश् आज माँ होतीं और होता उनका आँचल जिससे पौंछ लेता मैं अपने आंसू और दुबक कर सो जाता वहीं । अपनी माँ की गोद में। ‘ बस।

विनोद कुशवाहा (Vinod Kushwaha)

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