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Editorial : “वर्ष 2020” छोड़े जा रहा कोविड की कड़वी यादें

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वर्ष 2020 जा रहा है, कड़वी यादें छोड़कर। कोविड-19 (Covid 19) की वैश्विक महामारी के बाद पूरी दुनिया में उलट-पुलट के लिए यह वर्ष याद किया जाएगा। वर्तमान की युवा पीढ़ी और बच्चे कुछ वर्ष तक तो इसे याद ही रखेंगे, फिर भूल जाएंगे पिछली महामारियों की तरह। यह मानव स्वभाव ही है, जो जल्दी किसी भी संकट से उबरने की क्षमता रखता है। वैश्विक संकट का वर्ष, भी जा रहा है। लेकिन, यादों में यह वर्षों बना रहेगा। वास्तव में, पुराने अनुभवी लोग कहते हैं कि प्रकृति आपको कुछ सिखाने की कोशिश करती है, उसने अपनी ताकत का अहसास करा दिया है, अब बस जरूरत है, प्रकृति के इशारे को समझकर, इस दौरान मिले अवसरों के साथ आगे बढऩे की। दुनिया में अनेक देशों ने कोशिशें की भी हैं। दुनिया बदल गयी है, जिन लोगों ने कोविड-19 से जिंदगी खोयी है, उनके परिजनों के लिए यह शायद कभी न भूलने वाला और मनहूस वर्ष हो सकता है। दुनियाभर में लाखों लोग इस महामारी की चपेट में आकर इस दुनिया से रुखसत हो गये, कुछ लोग पीडि़त होकर ठीक हुए, वे भी किसी न किसी कष्ट से जूझ रहे हैं। रोग के दौरान की पीड़ा को वे स्वयं और उनके परिजन ही समझ सकते हैं। उनके मानसिक हालात को उनसे ज्यादा बेहतर कोई नहीं समझ सकता। जो लोग इस पीड़ा से नहीं गुजरने, वे अब भी लापरवाह बने हुए हैं, जबकि संकट अभी टला नहीं है। अब भी मरीज मिलना बंद नहीं हुए हैं। वायरस किसी को, कभी भी अपनी चपेट में ले सकता है।
इस वैश्विक महामारी ने मास्क को जीवन का हिस्सा बना दिया है। पूरे साल मास्क और सेनेटाइजर के साथ बीता। अपनों से शारीरिक दूरियां बनाने की मजबूरी रही। कभी गले मिलकर आत्मा के संबंध निभाने की परंपरा वाले देश भारत में यह दौर काफी पीड़ादायक रहा। हाथ मिलाने जैसी संस्कृति के देशों ने भारतीय संस्कृति के हाथ जोड़कर अभिवादन करने जैसी बातों को अपनाया। डाक्टर्स, पैरामेडिकल स्टाफ का कष्ट, कोरोना पीडि़तों से ज्यादा था। कई-कई घंटे भीषण गर्मी के दौर में पीपीई किट में गुजारना पड़ा। अपनों से नहीं मिल पाने की मजबूरी में भी वे मरीजों की सेवा में मजबूती से डटे रहे। कभी घर भी गये तो बाहर से केवल परिवार को देखकर संतोष करना पड़ा। दरवाजे पर या आंगन में घर की रोटी का निवाला निगला, बच्चों को दूर से ही देखा। क्योंकि मरीजों को ठीक करने के साथ-साथ परिवार को भी सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी थी। दो-दो जिम्मेदारियों का बोझ उठाकर भी उनके कंधे मजबूत रहे।
कोविड-19 चीन से चलकर जब वल्र्ड टूर पर निकला और हर देश में अपना दायरा फैलाते गया तो दुनिया भर के अनेक देशों ने तालबंदी और पाबंदी लगाना शुरु की। जो लोग घरों में नहीं रहते थे, उनके पैर ठिठक गये, हवाईयात्राएं बंद। ट्रेनें जो आपातकाल में भी नहीं रुकीं, उनको भी ठहरना पड़ा। सड़कें सूनीं हो गयीं। स्कूल, सांस्कृतिक आयोजन, खेलकूद और अन्य गतिविधियां भी बंद करनी पड़ी। अनेक उद्योग धंधे बंद हुए, जो बंद किये जा सकते थे। हालांकि जरूरी सामान बनाने का काम जारी रहा। कोरोनाकाल में लगी पाबंदियों को स्वीकार करने में लोगों को वक्त लगा। सामाजिक और शारीरिक दूरियों को भी स्वीकारने में वक्त लगा, लेकिन इसे वक्त की जरूरत समझकर लोगों ने अपनाया। जो बदलाव सरकार के हाथ धुलाओ कार्यक्रम से नहीं आया, कोविड-19 ने ला दिया। अब लोग साबुन से हाथ धोकर ही खाना खाने लगे। वैवाहिक कार्यक्रम अपनों के बिना भी हुए, मंदिरों में भगवान और पुजारी के ही संबंध चलते रहे, भक्त मंदिरों से दूर हो गये। घर में भगवान से महामारी से निजात दिलाने की प्रार्थनाएं चलती रहीं। बच्चों ने शिक्षा का ऑनलाइन तरीका सीखा और कक्षाएं नहीं लगने के दुख को आंशिक रूप से कम किया। महामारी ने लोगों के आर्थिक हालात पर बुरी तरह से प्रभाव डाला है। करोड़ों लोग रोजगार चले जाने से गरीबी में जा पहुंचे हैं और भी कई असर हैं, जो दिखाई दे रहे हैं और कुछ आगे आने वाले दिनों में भी दृष्टिगोचर होंगे।
लेकिन एक वर्ष के इसी अंतराल में जब दुनिया महामारी का सामना कर रही थी। वैज्ञानिक इस वायरस का अंत करने के लिए वैक्सीन की खोज में जुटे थे। आशा की जा रही है, कि इस वर्ष के साथ वायरस की भी दुनिया से विदाई होगी होगी और जल्द ही महामारी से बुरी तरह प्रभावित दुनिया जल्दी और मज़बूती से उबरकर पुन: आगे के सफर पर चल पड़ेगी। लेकिन, अब कुदरत के इशारों को समझेंगे, यह भी आशा की जानी चाहिए, अन्यथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव कह ही चुके हैं, यह अंतिम महामारी नहीं है, आगे भी आएंगी, हमें जीने के तरीके बदलने और ऐसी महामारियों से लडऩे की तैयारी रखनी होगी।

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