दीपावली की सफाई के साथ करें नशे का सफाया

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सैकंड हैंड धूम्रपान से परिवार हो रहा है परेशान
शिक्षक राजेश पाराशर ने विज्ञान मॉडल से नशा को नाश करने का दिया संदेश

इटारसी। सामाजिक न्याय विभाग (Social Justice Department) के उपसचिव शीलेन्द्र सिंह (Deputy Secretary) (Sheelendra Singh), कलेक्टर नीरज कुमार सिंह (Collector Neeraj Kumar Singh) एवं जिला पंचायत सीईओ मनोज सरियाम (District Panchayat CEO Manoj Sariam) के निर्देशन में जागरूकता कार्यक्रम (Awareness Program) में शिक्षक राजेश पाराशर ने विज्ञान मॉडल (Science Model) से नशा को नाश करने का संदेश दिया है।
जलती हुई सिगरेट का धुआ जैसे-जैसे फेफड़े में समाता गया फेफड़े का रंग बदलता गया। पीला होता हुआ यह काले रंग में बदल गया। इसके साथ ही धूम्रपान करने वाले मॉडल के समीप खड़े लोगों के हाथों में प्रदर्शन के लिये रखे फेफड़े के मॉडल भी रंग बदलने लगे और उसमें कैंसर (Cancer) लिखा दिखने लगा। यह सब कुछ एक कार्यक्रम में आम जनता के सामने प्रदर्शित किया विज्ञान शिक्षक राजेश पाराशर ने। अनेक वर्किंग मॉडल (Working Model) की मदद से आम लोगों ने नशे से होने वाले घातक प्रभावों को समझाने कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
श्री पाराशर ने बताया कि यह कार्यक्रम मध्यप्रदेश शासन (Government of Madhya Pradesh) के सामाजिक न्याय विभाग के उपसचिव शीलेन्द्र सिंह के मार्गदर्शन तथा नर्मदापुरम कलेक्टर नीरज कुमार सिंह एवं जिला पंचायत सीईओ मनोज सरियाम के निर्देशन में आयोजित किये जा रहे हैं। नशा मुक्ति अभियान के अंतर्गत शराब, तंबाखू, सिगरेट, बीड़ी, हुक्का तथा अन्य मादक पदार्थों के शरीर, परिवार, समाज पर होने वाले दुष्परिणामों को विज्ञान प्रयोंगों के द्वारा बताया जा रहा है। इसमें युवाओं को विशेष लक्ष्य समूह बनाया गया है।
राजेश पाराशर ने संदेश दिया कि कुछ लोग आदिवासी वर्ग को शराब जैसे नशों के साथ जुड़ा हुआ मानते हैं। उनके विकास में बाधक बनी इस आदत को मान्यता देना उचित नहीं है। कमजोर वर्ग को भी इसकी आदत से मुक्ति दिलाने सभी की जिम्मेदारी है। इस बात को ध्यान में रखते हुये जनजातीय कार्य विभाग (Tribal Affairs Department) के उपायुक्त जे पी यादव एवं सहायक आयुक्त श्रीमती चंद्रकांता सिंह के मार्गदर्शन में आदिवासी ग्रामों में ये जागरूकता कार्यक्रम किये जा रहे हैं। राजेश पाराशर ने बताया कि जब कोई व्यक्ति घर में धूम्रपान करता है के द्वारा तो परिवार के बच्चों, महिलाओं को भी धुआं अपनी सांस के साथ लेना पड़ता है। इसे सैकंड हैंड स्मोकिंग कहते हैं जो कि इन सभी पर घातक प्रभाव डालता है। इसे भी रोकने की आवश्यकता है।

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