संत गौरीशंकर महाराज जी करते थे हथेली पर पार्थिव शिव लिंग पूजन

संत गौरीशंकर महाराज जी करते थे हथेली पर पार्थिव शिव लिंग पूजन

झरोखा: पंकज पटेरिया: जमात वाले बाबा के नाम से विख्यात संत शिरो मणि योगी राज सिद्धि विभूति परम पूज्य गोरी शंकर महाराज जी महान शिव भक्त थे, मां नर्मदा के प्रति भी असीम आस्था श्रद्धा, और भक्ति महाराजजी के हृदय मे थी।
महाराज जी ने संभवत नर्मदा परिक्रमा शुरू की और यह विदित कि नर्मदा जी एक मात्र ऐसी नदी है, जिनकी परिक्रमा की जाती है। उनकी परिक्रमा जमात बहुत विशाल होती थी। जिसमे सैंकड़ों साधु महात्मा, हाथी घोड़े ऊंट संग संग चलते थे। अग्रेजी शासन था एक, अग्रेज कमिश्नर को इतना बड़ा लाव लशगर देख कर शक हुआ कि इतने बड़ी जमात खर्च ये लगोटी धारी लोग केसे उठाते होंगे? जरूर ये लूटमार आदि करते होंगे, लिहाजा अंग्रेज अफसर वहां जा धमका, ओर सीधे सवाल दागते पुछ बैठा तुम इतने बड़ी जमात, हाथी, घोड़े आदि के खाने पीने का प्रबंध केसे करते हो? महाराज जी ने बेफिक्री से मुस्कुराते उत्तर दिया, नर्मदा मैया करती है। अंग्रेज साहब बहादुर स तुष्ट नही हुआ, गुस्से में बड़बड़ाता यह बोलकर चला गया,कल मैं इस बात तजदीक करूंगा। दूसरे दिन अफसर आ गया महाराज जी को लेकर नाव से बीच नर्मदा जी मे पंहुचा बोला तुम्हारी नर्मदा मैया सेबोल कर इसी वक्त 1100 सोने का मोहरे का प्रबंध करवाओ। महाराज जी नेउसीपल हाथ जोड़ मां नर्मदा को प्रणाम कर एक हाथ पुरषा पुरषगहरी नर्मदा जी मेंडाल हिलाया और निकाला तो एक लाल रंग की थैली निकली,जिसमे चमचमाती सोने की पूरी 1100, मोहरे थी।

यह चमत्कार आंखो के सामने देख अंग्रेज अफसर क्षमा मांग लज्जित हुआ महाराज जी के चरणों मेंगिर पड़ा।बाद में बह महाराज जी का भक्त बन गया, और उसने पूरे रीजन में एक फरमान जारी कर दिया दे आर आल ग्रेट सेंट , दे सुड ना टवी डिस्टर्ब । उसके बाद अंग्रेज अफसर पूरी जमात का सम्मान करने लगे थे। इन्ही महाराज जी की समाधि निकटवर्ती गांव खो कसर मे है। इन्ही महाराज जी की जमात से परम पूज्य संत श्री धूनी वाले जी का शुभागमन होशंगाबाद में हुआ था।

हथेली पर पार्थिव लिंग पूजन गोरी शंकर महाराज जी महायोगी थे, और अति इंद्रिय शक्ति क्षमता संपन्न थे। जी वन भर नर्मदा परिक्रमा करते रहे,ओर करते रहे नित्य हथेली पर पार्थिव लिंग की पूजन। धूनी वाले दरबार के परम भक्त और शिष्य
श्री मुन्नू ठाकुर जी बताते है,महाराज हथेली पर शिव लिंग बनाकर आव्हण रुद्री सहित शोड्श उपचार पूजन अभिषेक कर आरती कर नित्य नर्मदाजी में विसर्जन भी करते थे। वैसे सदा लेकिन सावन के इस पावन मास में मिट्टी के पार्थिव शिव लिंग और कम,से कम 11 रुद्री और शिव परिवार निर्मित कर पूजन का अनंत पुण्य फलदाई महत्व है।शिव पुराण में श्री पार्थिव शिव लिंग पूजन का प्रामाणिक वर्णन है। किसी पवित्र नदी तालाब नहर, बामी, खेत से मिट्टी लाकर शुद्ध जल से धोकर, दुग्ध, गाय घी मिलाकर शिव लिंग निर्माण करे, रुद्री आदि को आसन देकर

आव्हान कर, श्रद्धा भक्ति से पूजन, कर नैवेद्य अर्पण करे आरती करे,शिवाष्टक, महिमन स्रोत,अथवा महा मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप करे संध्या जल में विसर्जन करे। शिवलिंग चार अंगुल से ज्यादा नहीं बनाना चाहिए। शिवजी केवीभिन्न नाम यथारूप महेश्वर शंभू पिनाक धारी शूल पानी आदि की भी पूजन,आठ मूर्ति दश दिशाओं की भी पूजन विधान बताया गया है। तुलसी दास जीने लिखा है(लिंग थापी विधि वत करे पूजा।शिव समानमोहि न दूजा)। कुश्मा डी ऋषि के पुत्र मंडप जी नेपार्थिव पूजन आरंभ की थी। अनेक देवासुर ने भी पार्थिव लिंग पूजन कर देवादेव शंकर की विशेष कृपा प्राप्त की है। पार्थिव शिव लिंग पूजन से सभी मानसिक शारी रिक कष्ट ओ से मुक्ति मिलती,
है, एवं सर्व भोग मोक्ष की प्राप्ति होती। ॐ नमः शिवाय।

पंकज पटेरिया
वरिष्ठ पत्रकार,साहित्य कार
9340244352,9407505691

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