अस्ताचलगामी सूर्य को व्रतियों ने दिया पहला अर्घ्य, कल  दूसरा अर्घ्य देकर होगा व्रत का समापन

अस्ताचलगामी सूर्य को व्रतियों ने दिया पहला अर्घ्य, कल दूसरा अर्घ्य देकर होगा व्रत का समापन

  • – कल सूर्योदय को दूसरा अर्घ्य देकर होगा व्रत का समापन
  • – सूर्य षष्ठी पर्व पर पथरोटा नहर पर लगा उत्तर भारतीयों का मेला
  • – सारा रात चलेगा महापर्व का आयोजन, सुबह संपन्न होगा व्रत

इटारसी। सूर्य देव (Surya Dev) की उपासना का पर्व छठ पर पथरोटा नहर पर आस्था से मनाया। उत्तर भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक समिति (North Indian Social Cultural Committee) द्वारा पथरोटा नहर (Pathrota Canal) पर छठी मैया (Chhathi Maiya) की पूजा का इंतजाम कराया जाता है। यहां सैंकड़ों व्रती एक साथ सूर्य को अर्घ्य देते हैं। आज अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही व्रतियों ने मंगल कामना भी की। उत्तर भारतीय परिवारों के सदस्यों ने नहर के प्रवाहित जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया। सोमवार को उगते सूर्य को गाय के कच्चे दूर्ध से अर्घ्य देकर इस तीन दिवसीय महापर्व का समापन होगा।

छठ महापर्व पर पथरोटा नहर किनारे आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा था। छठी मइया के गीत वातावरण को छठमय बन रहे थे। उत्तर भारतीय समुदाय का प्रमुख पर्व छठ पूजा के लिए नहर किनारे बेदी बनायी गयी थीं। व्रतियों ने पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया। शुक्रवार को महापर्व छठ पूजा 17 नवंबर को नहाये-खाये परंपरा से प्रारंभ हुई। व्रती ब्रह्मचर्य का पालन करते और पवित्र होकर उपासना करते हैं। पूरा परिवार तामसिक वस्तुए जैसे लहसुन-प्यास का त्याग करते हैं, पूर्णत: शाकाहारी होकर सूर्य भगवान और उनकी पुत्री षष्ठी देवी की उपासना का संकल्प लेते हैं। नहाकर और खाकर इसकी शुरुआत की गई। दूसरे दिन खरना में दिनभर व्रत के बाद शाम को गुड़ या गन्ने के रस से चावल और रोटी बनाकर खायी। हवन-पूजन करने के बाद केवल एक टाइम इसे खाया जाता है। दूसरे दिन शनिवार से निर्जला व्रत की शुरुआत हुई है।

आज छठ पूजा जलस्रोत के किनारे भगवान सूर्य की उपासना करके की गई। छठ पूजा संतान प्राप्ति या संतान के सुखमय जीवन के लिए किया जाता है। कहा जाता है कि ऋषि च्यवन (Rishi Chyavan) को क्षय रोग होने पर उनकी पत्नी ने इस व्रत को किया तो वे ठीक हो गये, इसलिए रोग मुक्ति के लिए भी इस व्रत को किया जाता है। कल सोमवार को चौथे दिन यानी 20 नवंबर को सुबह गाय के कच्चे दूध से उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दौरान व्रती सूर्य देव से अपनी संतान और परिवार के सुख शांति के लिए कामना करते हैं। उत्तर भारत सामाजिक सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष रघुवंश पांडेय (Raghuvansh Pandey) ने बताया कि अब यह केवल उत्तर भारत का नहीं बल्कि संपूर्ण भारत में और विश्व में भी मनाया जाने लगा है। यह साल में दो बार चैत्र माह कार्तिक शुक्ल की षष्टी को मनाया जाता है। इसे उत्तर बिहार और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज के लोग भी करते हैं। उत्तर भारतीय समाज से विनीता पांडेय ( Vineeta Pandey) ने बताया कि इसे सीता मैया ने भी किया था। यह दुनिया का इकलौता पर्व है जो अस्ताचल सूर्य का अर्घ्य देकर शुरु होता और सूर्याेदय के साथ खत्म होता है।

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AUTHORRohit

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