इटारसी। अभी तक भरोसा नहीं हो रहा की खेल खत्म के 10 मिनट पहले इंडिया 4 गोल और ऑस्ट्रेलिया 2, और खेल खत्म होने के बाद स्कोर इंडिया 4 और ऑस्ट्रेलिया 6 गोल। अब तो यह तय है कि यहां समस्या खेल की, प्लानिंग की, टेक्टिक की, फिटनेस की, स्टेमिना की, स्किल की या टेक्नोलॉजी की नहीं अपितु खिलाडिय़ों के अवचेतन में बैठी ऑस्ट्रेलियाई होव्वे की और मनोविज्ञान की है। हम विश्व के श्रेष्ठ टीम और ओलिंपिक चैंपियन बेल्जियम से खेलते हैं, तो जीत का अनुपात दो तिहाई रहता है। हॉलैंड, जर्मनी के सामने अधिकांशत: बराबरी का मुकाबला होता है। इंग्लैंड, स्पेन, न्यूजीलैंड, अर्जनतीना पर हम ज्यादातर भारी पड़ते हैं, मगर ऑस्ट्रेलिया का हौव्वा खत्म होने का नाम ही नहीं लेता।
ब्लेक गोवर्स, जैक व्हिटन, मैथ्यू डोसन, जर्मी हेवड्र्स के पास बॉल आती है, तो इंडियन डिफेंस पानी मांगता नजर आता है, जबकि हमारे डिफेंस में अमित रोहिदास, सुमित कुमार, हरमनप्रीत जैसे बेहद शानदार, विश्व स्तरीय डिफेंडर्स हैं। वल्र्ड नंबर वन गोलकीपर श्रीजेश है। मिडफील्डर बॉल को आगे बढ़ाना भूल जाते हैं, और फॉरवर्ड बॉल ट्रैपिंग भूल जाते हैं, ऑन टारगेट शूट करना भूल जाते हैं, सारा परिदृश्य एकदम हताशपूर्ण और हैरान करने वाला हो जाता है। पूरी टीम एक नौसिखिए की मानिंद दिखाई पड़ती है। जब बेहद शुरुआत में फिरंगियों ने दो गोल किये तो लगा कि फिर आज बड़ी फजीहत होने वाली है, मगर क्रेग फुल्टन के इरादे अलग थे, उसने टीम कॉम्बिनेशन और फ्लेक्स टेक्टिक्स में आमूलचूल परिवर्तन किये और टीम इंडिया ने हैरतंगेज बाउंस बेक किया और टीम ने 4 लगातार गोल कियेे। शुरुआती दोनों क्वार्टर्स में मिडफील्ड और फॉरवर्ड में अद्भुत सामंजस्य एवं लयबद्धता दिखी।
पोजिशनल मार्किंग, मेन टू मेन पासेस, ओवरहेड बॉल सब कुछ बढिय़ा, और इसी के साथ फस्र्ट हाफ समाप्त। ऐसा लगा की फस्र्ट हाफ मीटिंग में किसी ने हमारे खिलाडिय़ों के कान में फूंक दिया, कि नहीं ये सब ठीक नहीं, सामने ऑस्ट्रेलिया है, तुम लोग भूल गए क्या? बस फिर क्या था, वही बीस, पच्चीस साल पुरानी, तथाकथित महान खिलाडिय़ों से सजी इंडियन हॉकी टीम वाली बुनियादी गलतियां, लगातार और अनवरत गलतियां। एक के बाद एक कंसीड होते गोल। विश्वास नहीं होता कि ये वही खिलाड़ी हैं जो फस्र्ट हाफ में इतना शानदार खेल रहे थे। खेर वही हुआ। ढाक के तीन पात। पहले के मैच में यह तय रहता था कि हम इनसे नहीं जीतेंगे। मगर इस मैच में लगा एकबारगी कि हम आज तो नहीं हारेंगे पक्के में। पता नहीं कि आगे हम कभी इनसे जीतेंगे भी कि नहीं।
हॉकी इंडिया मैनेजमेंट और ऑफिशियल्स को अब कुछ नया, अजूबा, लीग से हटकर, सोचना होगा। खिलाडिय़ों के लिए किसी ख्यात ओरिटर द्वारा माइंड सेट दुरुस्त करने हेतु? खिलाडिय़ों के लिए मेडिटेशन या विपश्यना पैकेज को लेकर? या ध्यान मुद्रा या त्राटक करवाने को लेकर? पेरिस ओलिंपिक में ऑस्ट्रेलिया और बेल्जियम दोनों हमारे पूल में हैं। टीम की पूरी एकाग्रता तीसरा आने की ही होने वाले हैं, कोई चमत्कार हो जाए तो बात दूसरी है। ओलिंपिक पदक की लड़ाई इस बार पिछली बार से कहीं ज्यादा कड़ी, मुश्किल और दुरूह होने वाली है। और हद तो तब और ज्यादा हो गई जब बेहद निचली रैंकिंग की टीम आयरलैंड से टीम इंडिया बमुश्किल जीती। आयरलैंड के मैच में हमारे खिलाडिय़ों के चेहरे पर ऑस्ट्रेलिया से मिली हार का खौफ, अवसाद, निराशा, साफ दिखाई दे रहा था। बिल्कुल भी ऐसा नहीं होना देना चाहिए लेकिन ऐसा था। बेशक यह खेल है। जीवन मरण का प्रश्न कतई नहीं। आगे चारों टीम से एक एक मैच और हैं।
टीम इंडिया पुन: अपने को पुनर्जीवित करे, अपने अस्तित्व के लिए पूरे प्राणप्रण से जूझे, लड़े, और विजित हो। ऐसी मनोकामना, ऐसी शुभकामना।

अखिल दुबे, इटारसी








