झरोखा : जहाज कप्तान के लिए जारी घमासान

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* राजधानी से पंकज पटेरिया :
अब इसे बदनसीबी नहीं तो और क्या कहे, कि कभी त्याग, तपस्या, कुर्बानी की भट्टी में तप के जिस धातु से निर्माण हुआ था भारी-भरकम जहाज, आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। जर्जर हो चला है, आपसी अहम की तकरार और मनमानी परिवारवाद आदि कारकों के कारण जंगी जहाज लोकतंत्र के सागर को प्रदूषित कर रहा है, शर्मसार कर रहा है। सब जानते हैं एक लंबी जद्दोजहद और एक बड़ी लड़ाई इसके बुनियाद में रही हैं। अनेकों हुतात्मा के बलिदान त्याग और यातना की कहानियां भी। लेकिन वह अपनी ही गलतियों की वजह से गलत हाथों में पायलटिंग के लिए जाता रहा और खुद ही अहम के आईलैंड से टकराता रहा। परिवारवाद के दलदल में फसता रहा, हिचकोले खाता रहा, जिन हाथों में रहा उन्होंने इससे अपनी बपौती समझा और वे सुविधा के महाटापू बनाते रहे। लेकिन अकुशल संचालन की वजह से यह सार्वजनिक निंदा और अवनति की भंवर में फंसता रहा। एक के बाद एक झटके लगे, लेकिन अहंकारी तथाकथित टीम को
शर्म का एहसास कभी नहीं हुआ। समझदार, अकलमंद लोगों ने इशारे भी दिए। सीधे-सीधे कहा भी, लेकिन यह उन्हें ही हाशिए पर ढकेलती रही।
आत्म सम्मान के चलते, वे खुद इस जहाज को छोड़ गए। उन्होंने अपने अलग अलग जहाज तय कर लिए। इधर विडंबना यह है कि उस बड़े जहाज के पायलटिंग के लिए कप्तानी के लिए सर्वसम्मति से एक राय नहीं बन पा रही है। भारी घमासान मचा हुआ है और जंगी जहाज हिचकोले खा रहा है। ईश्वर जाने आगे क्या होता है, अभी तो नजारे यही है।


पंकज पटेरिया
वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार
9340244352 ,9407505651

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