शुक्रवार, जून 21, 2024

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झरोखा : कहीं ना कहीं कोई ना कोई होता है…

– पंकज पटेरिया:
करीब १० बजे सुबह की बात है मैं रोज की तरह अपने सीनियर साथी पत्रकार स्व. कल्याण जैन की दुकान पहुंचा। वे खबर लिख रहे थे। मैंने कहा कोई खास खबर बताइए हम भी कुछ एक्सक्लूसिव देंगे। उन्होंने बताया मंदिर वाली गली में किराए के मकान में एक स्वजाति भले आदमी मेरे मित्र रहते हैं। यह बहुत परेशान हैं। उनके यहां अपने आप आग लग जाती है। कभी कपड़े की अलमारी में, कभी किचन में, कभी रजाई गादी में, कहीं पहने हुए कपड़ों में, घर का सामान जल जाता है। तुम फ़ील्ड पर चले जाओ, शायद बातचीत करने से कुछ और जानकारी मिल जाए। मैं उस गली में पहुंचा वहां मेरे दो अनुज भाई विश्वंत द्विवेदी और हरिओम दिक्षित रहते थे। मैंने उससे मामले की पुष्टि कर उन सज्जन से भी आपबीती सुनी। बहरहाल सारा वृत्तांत सुनकर मैं भी हैरानी से भर गया। लौटकर कल्याण जी के पास आया हमने खबर बनाई अपने-अपने अखबार को भेजी। वे सज्जन स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत, समय समय पर घर बदलते रहे लेकिन हर बार घर में कहीं ना कहीं आग लगती रहती थी। हालत ये हुई लोगों ने उन्हें मकान किराए से देना से बंद कर दिया।
पुण्य सलिलामां नर्मदा जी गोद में बसा यह नगर भी चिंता, आकुल, अनजाने भय से भरने लगा। खबर छपने के बाद बहुत सारे गुनिया ओझा तांत्रिकों ने इसे ठीक करने का दावा किया लेकिन सब के दावे फेल हुए और वह हादसा चलता रहा। किसी और जानकार की सूचना मिलने पर कुछ लोग उन व्यक्ति को निवेदन कर लेकर आए। उन्होंने कुछ नहीं लिया बस उस आपदाग्रस्त मकान में कुछ पूजा की। तकरीबन 1 घंटे की पूजा के बाद जो भी अलाय बलाय रही हो, हमेशा के लिए रुखसत हुई। वह मकान भी उस बाधा से मुफ्त हुआ। कई किराएदार आए गए फिर कोई ऐसी घटना नहीं हुई।
नर्मदे हर

pankaj pateriya
पंकज पटेरिया (Pankaj Pateriya)
वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार
ज्योतिष सलाहकार
9893903003
9340244352

(नोट: झरोखा की इस सीरीज की किसी कड़ी का बगैर संपादक अथवा लेखक की इजाजत के बिना कोई भी उपयोग करना कानूनन दंडनीय है। सर्वाधिकार सुरक्षित हैं।)

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