विनोद कुशवाहा/ तमिल फिल्मों के सुपर स्टार रजनीकांत को उनके जीते जी अंततः फिल्म जगत के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहब फाल्के एवार्ड से नवाजे जाने की घोषणा हो ही गई। जीते जी इसलिये कहा क्योंकि हमारे देश में कुछ पुरस्कार ऐसे हैं जिनकी याद व्यक्ति के गुजर जाने के बाद ही आती है। साथ ही मैंने रजनीकांत को तमिल फिल्मों तक इसलिये सीमित रखा क्योंकि हिंदी फिल्मों में वे चल नहीं पाए। जबकि वे मूलतः तमिल नहीं हैं। यहां ये उल्लेखनीय है कि दक्षिण भारत से आई अभिनेत्रियों ने तो हिंदी फिल्म संसार में अपने सौंदर्य और अभिनय की न केवल धाक जमाई बल्कि वर्षों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। मात्र वहीदा रहमान, वैजयंती माला, रेखा, हेमामालिनी, श्री देवी, जया प्रदा ही नहीं वरन फिल्म इंड्रस्टी में कदम रखने वाली कितनी ही नवोदित अभिनेत्रियां ऐसी हैं जो युवा दिलों की धड़कन बनी हुई हैं। जबकि रजनीकांत गायकवाड़, कमलाहसन, नागार्जुन, वेंकटेश, चिरंजीवी, सूर्या आदि जैसे कितने ही लोकप्रिय एवं प्रतिभाशाली अभिनेताओं को असफल होकर वापस दक्षिण की ओर लौटना पड़ा। आश्चर्यजनक तथ्य ये है कि हिंदी मूल की या हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों ने भी दक्षिण भारतीय फिल्मों में अपनी सफलता का परचम लहराया है। ख़ुशबू, कोमल, काजल अग्रवाल, आरती छाबडिया आदि अभिनेत्रियों ने तो दक्षिण भारत की फिल्मों में अपनी सत्ता स्थापित की है। खुशबू, कोमल महुआकर की वहां पूजा होती है। उनके प्रशंसकों ने इन अभिनेत्रियों के मंदिर तक बनाकर रखे हैं। खुशबू ने पिछले दिनों ही भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली है। साथ ही वे पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में भी हैं। अमित शाह स्वयं उनका प्रचार करने के लिए गए थे। काजल अग्रवाल दक्षिण भारतीय फिल्मों की ऐसी पहली अभिनेत्री हैं जिनका पुतला अब मैडम तुसाद के संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहा है। चलिए वापस लौटते हैं धुंडिराज फाल्के पुरस्कार की तरफ। उसके पहले एक गोपनीय प्रश्न। अपने पाठकों से। कपूर परिवार के कितने लोगों को ये पुरस्कार खैरात की तरह बांटा गया है ? जरा सोचिएगा।
जहां तक इस बार दिए गए दादा साहब फाल्के पुरस्कार की बात है तो मेरे विचार से दक्षिण भारत के ही कमलाहसन जैसे सशक्त अभिनेता भी इसके दावेदार थे। अमिताभ बच्चन से एक बार किसी पत्रकार ने सवाल किया कि – ‘लगभग पूरा देश अमिताभ बच्चन का फैन है। अमिताभ बच्चन किसके फैन हैं? ‘अमिताभ ने जवाब दिया – “कमलाहसन”। ये सही भी है क्योंकि कमलाहसन बेजोड़ अभिनेता हैं। रही बात फैन्स की तो केवल फैन फॉलोइंग को ही आधार नहीं माना जा सकता। मगर कमलाहसन को ये पुरस्कार किसी भी सूरत में नहीं दिया जा सकता था क्योंकि आज की स्थिति में वे भी राजनीति में हैं और इतने भर से वे मानने वाले थे नहीं।
अमिताभ बच्चन पर से याद आया। फिल्म ‘अग्निपथ’ में उनके साथ रहे मिथुन चक्रवर्ती को बेस्ट सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर एवार्ड मिला था लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। उन्हें तो फिल्म मृगया, ताहादार कथा, स्वामी विवेकानंद के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। फिर मिथुन दा डिजर्व भी करते हैं। पिछले दिनों भाजपा ज्वाइन करने को लेकर वे सुर्खियों में रहे। क्यों न रहें ? उन्हें पश्चिम बंगाल के भावी मुख्यमंत्री का सपना जो दिखाया जा रहा है। साथ ही पूरा हिंदुस्तान देख रहा है कि किस तरह एक असाधारण प्रतिभा राजनीति के साधारण से चक्रव्यूह में फंसकर दम तोड़ देती है। चक्रवर्ती जी इस चक्रव्यूह से बाहर निकलिए। आप राजनीति के लिये नहीं बने हैं।
वैसे कहने को तो इस देश में कुछ भी हो सकता है। जहां सैफ अली खान, अक्षय कुमार जैसे अभिनेताओं को राष्ट्रीय पुरस्कार दे दिया जाता है जिनकी अभिनय प्रतिभा का फैसला आप स्वयं कर सकते हैं। फिलहाल बात अक्षय कुमार की जिनके पास न तो चॉकलेटी चेहरा है न ही अभिनय प्रतिभा है। चेहरे के नाम पर उनके पास ‘ मसूड़ों ‘ के सिवा कुछ भी नहीं है। रही अभिनय प्रतिभा की बात तो उनके खाते में कुछ अच्छी फिल्में जरूर आईं पर वे ऐसे अवसरों को भुना नहीं पाए। इन फिल्मों में उन्होंने बेहद निराश किया। अब उनके पास एक ही काम रह गया है मोदी जी से मुलाकात करना और ब्रांडिंग तलाशना। राजेश खन्ना के आशियाने ‘ आशीर्वाद ‘ को तो वे काका से जुड़ी स्मृतियों के म्यूजियम में तब्दील कर नहीं पाए। क्यों ? ये जगजाहिर है।
सही मायने में तो राजेश खन्ना ही सुपर स्टार थे। उनके जैसा क्रेज तो फिल्म इंडस्ट्री में किसी का नहीं रहा। रजनीकांत का भी नहीं। राजेश खन्ना ने ‘आनंद’ जैसी माइल स्टोन फिल्म दी है। जबकि रजनीकांत अपनी फिल्मों में कलाबाजियां भर दिखाते रहे । क्या राजेश खन्ना को दादा साहब फाल्के पुरस्कार नहीं दिया जा सकता था? एक बार अपने जन्मदिन पर सलमान खान अपने परिवार के साथ अपने फैंस को दर्शन देकर सीना फुला रहे थे तब सलीम साहब ने कहा था – ‘ सलमान ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। काश् तुमने काका का क्रेज और उनके फैन देखे होते। ‘ खैर।
तो अक्षय कुमार ने राजेश खन्ना की स्मृतियों को संजोकर रखने के कोई प्रयास नहीं किये। सही भी है । अन्यथा 100 करोड़ कैसे उनके हाथ आते। काका भी उन्हें बेहतर समझते थे । इसलिये ही उन्होंने कभी अक्षय कुमार को पसन्द नहीं किया। राजेश खन्ना ने उनको और डिम्पल को अपनी संपत्ति में से एक कौड़ी देने लायक भी नहीं समझा। पैसे के लिए तो अक्षय ने अपनी पत्नी ट्विंकल खन्ना तक को विज्ञापनों की दुनिया में उतार दिया। वह भी फिल्म इंड्रस्टी के बहुचर्चित ‘गे’ करण जौहर के साथ। अक्षय कुमार से तो मोहित सूरी लाख दर्जे खरे हैं । रजनीकांत भी किसी न किसी रूप में समाज सेवा से जुड़े हुए हैं। चलिए छोड़िए। अक्षय अनन्त अक्षय कथा अनन्ता। आगे बढ़ते हैं।
अब बात करेंगे फिल्म फेयर एवार्ड की जिनके बारे में कहा जाता है ये एवार्ड बेचे – खरीदे जाते हैं। धर्मेंद्र, आमिर, गोविंदा जैसे कितने ही अभिनेताओं ने इस तरह के एवार्ड खरीदे- बेचे जाने की बात स्वीकार की है । यहां तक कि ऑस्कर एवार्ड तक के लिए लॉबिंग किये जाने की चर्चा होती रहती है। मदर इंडिया , लगान के उदाहरण सामने हैं । साहित्य अकादमियों द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कारों का तो भगवान ही मालिक है। अपनों का, अपनों के द्वारा, अपनों के लिये दिए जाने वाला पुरस्कार साहित्य अकादमियों का पुरस्कार रहता है ।
स्थानीय स्तर पर भी ये खेल चल रहा है । गणतंत्र दिवस पर गांधी ग्राऊंड में साहित्यकारों को दिए जाने वाले पुरस्कारों और सम्मान के क्या मापदंड हैं ? साहित्य जगत को तो छोड़िए कतिपय अपवादों को छोड़कर इनमें से कुछ कवियों की तो शहर के साहित्यिक अवदान में भी कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं है फिर भी उन्हें सम्मानित कर दिया गया और दिनेश द्विवेदी , सनत मिश्र , श्रीराम निवारिया , सुधांशु मिश्र जैसे स्वनामधन्य साहित्यकार घर बैठे रह गए। इसकी विस्तृत चर्चा फिर कभी । इति पुरस्कार कथा ।
अंत में फिर लौटते हैं रजनीकांत पर जिन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिए जाने की घोषणा होते ही सबसे पहले प्रधानमंत्री ने मुबारकबाद दी है । क्या उन्हें दिया जाने वाला दादा साहब फाल्के पुरस्कार तमिलनाडु में होने वाले चुनावों के परिप्रेक्ष्य में है ? क्या ये पुरस्कार इसलिये दिया जा रहा है कि रजनीकांत ने चुनाव के राजनीतिक कुरुक्षेत्र में उतरने से पहले ही अपने पैर वापस खींच लिये ? विचार करियेगा।…क्योंकि आप इस देश के एक जागरूक नागरिक हैं।
विनोद कुशवाहा (Vinod Kushwaha)
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