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चुनाव सन्दर्भ : माननीया की होगी ताजपोशी…

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: पंकज पटेरिया, नर्मदापुरम –
सूबे में होने वाले आगामी त्रिस्तरीय चुनाव की पहली कवायद पूरी हो गई और तदानुसार नगरीय विकास एवं आवास आयुक्त निकुंज श्रीवास्तव की देखरेख में राजधानी में हुई वैधानिक प्रक्रिया का नवनीत निष्कर्ष खासा लजीज साबित हुआ है। खास तौर मां नर्मदा की गोद में बसे राजधानी के बगलगीर अपने नर्मदापुरम (होशंगाबाद) के मामले में मातृ शक्ति का कद बड़ा है।
जाहिर है इस निर्णय से महिला जगत में उत्सवी माहौल है तो भैयाजी लोगों में मायूसी। अभी जिला पंचायत अध्यक्ष पद महिला के लिए आरक्षित किया है, तो नगर पालिका में भी अध्यक्ष पद मातृशक्ति के लिए आरक्षित किया है।
कोरोना के पहले नगर पालिका, नगर पंचायत चुनाव को लेकर अटकलों के बाजार गर्म थे। उस पर कोरोना ने जरूर पाला मार दिया था, फिर उसके बाद सामान्य दिन लौटे, चर्चाओं के बाजार फिर गर्म होने लगे थे। शक सुब्हो की चौपड़ जमती जरूर थी, लेकिन भैया जी लोग बेफिक्र थे, कि अपनी ही चलेगी इन पदों पर। अपने को सारी ताकत झोंक देनी है। लेकिन सारे अनुमानी बैलून फट फट फूट गए और कुछ की हवाएं ख्वाब के आकाश में उड़ते-उड़ते निकल गई।
जिला पंचायत और नगर पालिका की कमान मातृ शक्ति ही संभालेंगी। यानी माननीया की ताज पोशी होगी और माननियों के मंसूबे गहरे डूब जाएंगे।
यहां यह स्मरणीय होगा कि ऐसा नर्मदापुरम जिपं पर और नगर पालिका में अतीत में यह अध्याय उद्घाटित हो चुका है। जिला पंचायत में एक बाद एक माननीया इस सिंहासन पर आरूढ़ हो चुकी हैं, तो नगर पालिका में भी अध्यक्षीय आसंदी पर माननीया शोभायमान रही हैं।
यहां भी यह सम्मान रुतबा दो दफा मातृशक्तियों के खाते में रहा है। अब यह बात तो अलग है, कहने को लोग कुछ भी कहते रहें भैया वो तो मिट्टी की माधव है, डोर तो किन्हीं और कर कमलों में है, खैर अपना इससे कोई वास्ता नहीं। लेकिन ऐसा है, आसमान में उड़ती पतंग किस-किस दिशा से उड़ रही हैं और किस-किस रंग की हैं, उड़ती, डोलती, हिचकोले खाती अपना पता ठिकाना तो देती हैं।
इस बार भी माननीया की ताजपोशी के फैसले से भैया जी लोगों यानी माननीयों के चेहरे मुरझाना मायने रखता है, लेकिन साहब गौर से, गहरे से जांच पड़ताल की जाए, आइना सामने होगा कि जितने अवसर पुरुषों को मिले, उतने ही स्त्रियों के हक में गए। कहीं-कहीं तो भैया जी लोग के हाथों में ही सारा रहा। कैसा रहा कार्यकाल उस दौर का उसका आकलन अपन करने वाले कोई नहीं।
पता है मनोवैज्ञानिक कहते हैं, मातृशक्ति नेतृत्व में पुरुषों की तुलना में कहीं भी कम नहीं हैं। इतिहास भी साक्षी है। महाराणा प्रताप की गौरव चर्चा होती है तो महारानी लक्ष्मीबाई का जिक्र सम्मान के साथ होता है। आधुनिक भारत में भी ऐसी कई मिसाले हैं।
फिर मेरा तो मानना है कि शक्ति के बिना इस चराचर जगत में कुछ भी संचालित नहीं होता, तो क्यों ना हम स्वागत करें अगर मातृशक्ति को मौजूदा सरकार ने ये खुशनुमा मौका दिया है। तो बेहतर है हमें तो इस श्लोक के साथ उनका सम्मान करना चाहिए। या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता नमस्तस्य नमस्तस्य नमो नम:। तो भैया धीर धरो, अनुपमा का वह सदाबहार गीत याद आता है। ‘धीरे धीरे मचल ऐ दिल बेकरार, कोई आता है, आयेगा आने वाला तो जनाब इंतजार का लुत्फ लीजिए। कोई न कोई दीदी, भाभी जी, जल्दी ही आपको दर्शन देगी।

नर्मदे हर।

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