कविता: जाड़े की धूप…

कविता: जाड़े की धूप…

जाड़े की धूप
सूरज की अटारी से
किरणों की सीढ़ी से
उत र रही
जाड़े की धूप।
गुनगुनी धूप।
फूलो का अख वार
आंगन में यार,
बांच रही
जाड़े की धूप।
गुनगुनी धूप।

गेंदे की मस्ती
शर्मीली सेवंती स हती,
खुशबू की चाय पीरही
जाड़े की धूप।

गुनगुनी धूप।
ओस का टा प पहने
दुबिया जींस पहने
गुलाबी स्कार्फ लपेटे
उतर रही आंखो में
यादों की धूप। गुनगुनी धूप।

पंकज पटेरिया (Pankaj Pateria)
9807505391,होशंगाबाद,मप्र

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